एक आदमी बिना दरवाजें और खिड़की के एक कक्ष में घुसता है और तभी किसी को बोलते हुए सुनता है ‘‘आज़ादी‘‘। दीवार की दरार से एक चिह्न फसा हुआ है। वह उसे सावधानी से उठाता है। वह एक तरफ से नुकीला था और उस पर लिखा था ‘‘आज़ादी‘‘। वह व्याकुलता से उसको कुछ समय ध्यान से देखता है। तभी एक हाथ उस दरार से बाहर आया और चिह्न को नीचे की ओर घुमाकर वापिस उस आदमी को दे दिया। आजादी जमीन पर थी। आदमी कालीन फाड़ता है और एक छोटा गड्ढा देखता है। वह नीचे तक पहुँचता है और उसका रंग बदल जाता है। वह अपने कक्ष के कालीन को हटाता है और उसकी जगह हरी ताजा घास बिछाता है। वह अपने कक्ष के मंद प्रकाश को और कम करता है और तब सम्पूर्ण प्रकाश को चमकते हुए पाता है। आखिर में वह दीवार से कुछ मैला वाॅल पेपर फाड़ता है, और फर्श के छेद में पहुँचता है और दीवार पर एक खूबसूरत बाहरी दृश्य की छवी फैलाता है। एक दरवाजा बनाता जाता है। वह अपने कक्ष से अज़ाद हो कर बाहर की ओर कदम बढ़ाता है। कक्ष विखंडित हो जाता है। और छेद गायब हो जाता है। लेकिन चिन्ह जमीन पर पड़ा होता है। वह उसे उठाता है और चलना शुरू करता है। कहीं बहुत दूर, कोई चिल्लाता है ‘‘अज़ादी’’! आदमी उस की ओर भागता है। वह स्लेटी रंग के वैसे ही कक्ष का एक पूरा मैदान पाता है, जो अभी तक बंद है, हर एक मे एक निवासी है। वह अपने आप में थोड़ा मुस्कुराया और अपना चिह्न लिए हुए निकटतम कक्ष की ओर भागता है। किसने उस आदमी को आज़ादी दी? क्यों वह ख़ुशी से दूसरों को उनकी स्वतंत्रता हासिल करने में मदद करता है? सच में आज़ाद होने का अर्थ क्या है? क्या आपने कभी ऐसी आज़ादी का अनुभव किया है? यह लघु फिल्म सीधे सुसमाचार संवाद के लिए नहीं, लेकिन सुसमाचार के लिए हमारी जरूरत कि एक बातचीत की सुविधा के लिए है। इस फिल्म का एक और नाम ‘‘खुद से आज़ादी’’ हो सकता है जिसका अर्थ खुद से आज़ाद होने का रास्ता ढूँढ़ना है । कभी कभी हमें अपनी चोटों, आदतों और पुरानी बातों से मुक्ति चाहिए होती है। फिल्म में दर्शाय गए आदमी की तरह हमें भीं बाहरी दुनिया से किसी कि मदद चाहिए हमें आजादी का रास्ता दिखाने के लिए। परमेश्वर अनुमती देते हैं और चाहते हैं कि हम उन्हें जाने। उनके अनुयायी होने के तौर पर हमें उनके त्याग और अपनी आजादी के बारे में दूसरों को आदर सहित और उल्लासपूर्वक बताना चाहिए। हमे दूसरों कि आज़ादी का हिस्सा बनने का मौका मिलता है। यीशु ही सच्चे मुक्तिदाता है। वे स्वर्ग से धरती पर सिर्फ हमें आज़ाद करने को आए थे। हमें एक ऐसा जन चाहिए था जो बाहर से हमारी दुनियाँ में आए और हमें बचाए। हमें एक जन की जरूरत है जो हमें आज़ाद करे। जब तक हम यीशु मसीह में आज़ादी नहीं पाते, हम परमेश्वर से अलग इन सांसारिक चीज़ों में ही फँसे रहेंगे। ‘‘पाप’’ या परमेश्वर के रास्ते के बजाए अपने खुद के बनाए रास्ते हो चुनना हमें परमेश्वर से अलग करता है। यही बात हम अपने अंदर देखते है जिससे हमें आज़ाद होना हैं। यीशु हमें आज़ादी का मार्ग दिखाते है और हमें उन सभी बातों से मुक्त करते जिनका हमें पछतावा है। इस से भी बड़कर वह हमारा मित्र बनना चाहते है। हम सच्ची आज़ादी तब प्राप्त करते है जब हम यीशु के साथ व्यक्तिगत संबंध में जुड़ते हैं। यीशु के साथ यह व्यक्तिगत संबंध जोड़ने के लिये हमें अपने आप को पापी मानना होगा और यह विश्वास करना होगा कि हमारे पाप हमें परमेश्वर से दूर करते है। उस आदमी की तरह जो उसके खुद के कक्ष में अपनी मदद नहीं कर पाया, हम भी ऐसा कुछ कर सकते अपने आप परमेश्वर के पास जाने के लिए। उसकी मृत्यु और मुर्दो में से जी उठने के द्वारा केवल परमेश्वर का पुत्र यीशु ही सक्षम है परमेश्वर और हमारे बीच के संबंध जोड़ने के लिए। परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से जानने के लिए हमें व्यक्तिगत रूप से यीशु को अपना छुड़ाने वाला और प्रभु मानना होगा ।